गिरिडीह: मां दुर्गा की विदाई के साथ ही गिरिडीह में दुर्गापूजा उत्सव का समापन हो गया। जिले के पपरवाटांड़, बनियाडीह और आम बागान में श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। कहीं ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच श्रद्धालु मां को विदाई देने निकले, तो कहीं महिलाओं ने खोइछा भराई और सिंदूर खेला की रस्म निभाई। इस दौरान भक्तों ने नम आंखों से मां दुर्गा को विदाई देते हुए अगले वर्ष फिर से आगमन की कामना की।
पपरवाटांड़ में 46 वर्षों की पूजा परंपरा का समापन
सीसीएल क्षेत्र के पपरवाटांड़ में सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति की ओर से पिछले 46 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। इस वर्ष भी यहां भव्य पूजा पंडाल और मेले का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
चार किलोमीटर की विसर्जन यात्रा, जयकारों से गूंजा इलाका
मेला समाप्त होने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को वाहन पर रखकर विसर्जन यात्रा निकाली गई। पपरवाटांड़ से करीब चार किलोमीटर की दूरी तय कर श्रद्धालु करहरबारी स्थित नावाआहार तालाब पहुंचे। यहां धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार प्रतिमा का विसर्जन किया गया।
विसर्जन यात्रा में महिलाएं, युवतियां और पुरुष बड़ी संख्या में शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों की गूंज और मां दुर्गा के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालु नाचते-गाते मां को विदाई देते रहे और अगले वर्ष फिर से आने की प्रार्थना करते नजर आए।
बनियाडीह में 100 साल से अधिक पुरानी बंगाली परंपरा के साथ विदाई
बनियाडीह स्थित सेंट्रल दुर्गा पूजा समिति की ओर से भी मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ किया गया। यहां पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से बंगाली परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है। समिति की सबसे खास परंपरा मां की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन स्थल तक ले जाना है।
कंधे पर प्रतिमा लेकर 500 मीटर दूर तालाब पहुंचे श्रद्धालु
विजयादशमी के बाद विसर्जन की तैयारी शुरू हुई। सबसे पहले विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद महिलाओं ने मां दुर्गा की खोइछा भराई की रस्म पूरी की। फिर श्रद्धालुओं ने प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाया और करीब 500 मीटर दूर स्थित तालाब तक पहुंचे।
ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच प्रतिमा का विसर्जन किया गया। मां की विदाई के समय श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। भक्तों ने अगले वर्ष फिर से मां के आगमन की कामना की। एक सदी से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था और बंगाली सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
आम बागान में खोइछा भराई और सिंदूर खेला के बाद विसर्जन
गिरिडीह के मुफ्फसिल थाना क्षेत्र स्थित आम बागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति की ओर से भी मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। समिति पिछले तीन वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना कर रही है। इस बार भी यहां भव्य पंडाल और मेले का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
महिलाओं ने निभाई पारंपरिक रस्म, सिंदूर खेला में दिखा उत्साह
विसर्जन से पहले पूजा पंडाल में महिलाओं ने मां दुर्गा की खोइछा भराई की रस्म निभाई। इसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर पारंपरिक सिंदूर खेला की रस्म पूरी की। इस दौरान मां की विदाई को लेकर भावुक माहौल देखने को मिला।
रस्में पूरी होने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को वाहन पर रखकर विसर्जन यात्रा निकाली गई। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों के साथ करीब एक किलोमीटर दूर सिहोडीह स्थित नदी के छठ घाट पहुंचे। यहां धार्मिक अनुष्ठान के बाद प्रतिमा का विधि-विधान से विसर्जन किया गया।
तीनों स्थानों पर दिखी आस्था, अगले वर्ष फिर आने की कामना
पपरवाटांड़ की 46 वर्षों पुरानी पूजा परंपरा, बनियाडीह की 100 साल से अधिक पुरानी बंगाली परंपरा और आम बागान में तीन वर्षों से हो रहे आयोजन ने गिरिडीह की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की झलक पेश की। प्रतिमा विसर्जन के साथ पूजा उत्सव का समापन हुआ, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में अगले वर्ष मां दुर्गा के फिर से आगमन की उम्मीद बनी रही।
जय मां दुर्गा! अगले बरस फिर आना।






